गुरुवार, 24 जुलाई 2014

अर्श से फर्श पर कांग्रेस --------जुलाई 2014 युवा मत मासिक पत्रिका में संपादकिय

                                                              अर्श से फर्श पर कांग्रेस 

                                                                                                                                    - Anchal Ojha                                                                                                                             


कहा जाता है कि सशक्त विपक्ष ही मजबूत लोकतंत्र का परिचायक है। किन्तु वर्तमान लोकसभा के परिणामों से स्पष्ट है कि जनता ने कांग्रेस को इतनी बुरी तरिके से धोया है कि मजबुत विपक्ष तो दूर की कौड़ी, 128 वर्ष पुरानी पार्टी के लिये चिंतन करना जरूरी हो गया है कि आखिर ऐसा हश्र हुआ क्यों ? 128 वर्ष पुरानी पार्टी के पास 44 सीटें और 30 वर्ष पुरानी पार्टी अपने दम पर सरकार बना रही है और एनडीए गठबंधन को तो 300 से ऊपर की सीटें, क्या यह महज एक इत्तेफांक है या फिर कांग्रेस की कमजोरी। किसी ने यह नहीं सोचा था कि कांग्रेस को इतनी बड़ी हार का सामना करना पड़ेगा, खुद कांग्रेस भी यह मान कर चल रही थी, कि 100 के पार तो हो ही जायेंगे, किन्तु परिणाम ने कांग्रेस को अर्श से फर्श पर ला दिया है। कांग्रेस ने गलती कहां कि इसे ज़रा ध्यान दें तो शायद यह समझ में आयेगा कि यूपीए-1 के दौरान मनरेगा जैसे कानून और लोगों के लिये उनकी ही गांव पर रोजगार की स्किम को कांग्रेस अच्छी तरह से भुनाने में कामयाब हो गई और इसी परिणाम रहा कि यूपीए-2 की सरकार बनी। लेकिन यूपीए-2 शुरू से ही विवादित रही, ऐसा नहीं कि इस कार्यकाल में कांग्रेस ने देश के लिये कुछ किया नहीं, बल्कि कांग्रेस अपनी निगेटिंव थिंकिंग के कारण खुद ही गर्त में जा गिरी। यूपीए-2 के दौरान कोल आवंटन घोटाला, 2जी, 3जी स्पेक्ट्रम, काॅमनवेल्थ जैसे कई मामले खुल कर सामने आये और इससे कांग्रेस की काफी किरकिरी हुई। कांग्रेस इस दौरान हाथ धरे बैठी नहीं रहीं अपितु उसने कार्यवाही भी तेजी से की किन्तु मिडिया में उसकी जो किरकिरी हुई उसे सुलझा पाने वह नाकाम रही। जब भी विपक्षीयों ने उस पर आरोप लगाया कांग्रेस के चापलुस नेताओं ने आरोप का उत्तर भाजपा के किसी घोटाले को सामने रख कर दिया। उसने कभी भी सच्चाई को सामने रखने का प्रयास नहीं किया। आज जब स्थिति खराब हो चुकी है तो वहीं पूर्व मंत्री जो कि कल तक उल्टे-पल्टे बयान देकर अपने पार्टी का गुणगान व जीत का दावा करते थे वे इसके लिये यह बता रहे है कि प्रधानमंत्री का न बोलना हार का कारण बना। फिलहाल हार कर बैठी कांग्रेस में आरोप-प्रत्यारोप तो काफी चलेंगे, काफी लोग पार्टी छोड़ कर जायेंगे, कई राजनीति से सन्यास भी लंेंगे, किन्तु अब सोचना यह है कि क्या यहां से कांग्रेस की राजनीति समाप्त हो गई अथवा आगे कि राजनीति करनी है। यदि आगे राजनीति करनी है तो कैसे कि जायेगी या फिर पांच साल जैसे गुजारने का इरादा है। क्या कांग्रेस को फिर से देश में स्थापित करने के लिये कोई रोड मैप है कि कैसे फिल्ड में क्या-क्या करना है और कैसे आमजनों की मानसिकता में परिवर्तन करने कर उसे कांग्रेस की ओर मोड़ने की आवश्यकता है। यदि पिछले चुनाव के भाजपा के चुनाव प्रचार अभियान की बारिकियों को ध्यान दें तो साफ है कि जून 2013 में संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष बनते ही मोदी ने रणनीति बनाकर जगह-जगह आमसभा व कई कार्यक्रमों की शुरूआत की। सितम्बर में प्रधानमंत्री पद का उम्मीद्वार घोषित होते ही ऐसे आमसभा व कार्यक्रम शुरू हुए कि एक दिन में 5 से 8 सभाएं हो जाती थी चारों ओर समाचार पत्र से लेकर इलेक्ट्रानिक्स मिडिया तक केवल मोदी का ही नाम व कार्यक्रम छपते थे। किन्तु कांग्रेस इस दौरान कहां थी, वास्तविक रूप में देखा जाये तो मानसिक तौर पर कांग्रेस ने पहले ही हार मान लिया था, तभी तो चुनाव से पहले व चुनाव के समय कांग्रेस सरकार में रहते हुए भाजपा से हमेशा पिछे रही। कांग्रेस के मंत्रियों ने हमेशा यह मान कर चला कि मोदी फेकू है, गुजरात दंगे की दाग से रंगे हुए हैं लोग इसका विरोध करेंगे और फिर जोड़-तोड़ कर कांगे्रस सत्ता में लौट ही आयेगी। कांग्रेस ने चुनाव घोषणा पत्र में अपनी उपलब्धियों को गिनाया था, किन्तु वहीं काम सरकार में रहते हुए भी वह मिडिया के माध्यमों से एक साल पहले नहीं कर पायी। जबकि भाजपा व मोदी ने पांच राज्यों में होने वाली विधानसभा चुनाव के पूर्व ही नरेन्द्र मोदी को लेकर तैयारी शुरू कर दी थी। कांग्रेस के प्रवक्ताओं ने हमेशा गुजरात को केन्द्रीत किया, नरेन्द्र मोदी के बयानों का कटाक्ष उन पर लगे आरोपों को लेकर देते रहे। लेकिन अपनी सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचा पाने में नाकाम रहे। उन्हें लगा कि निगेटिव कैम्पेन के जरिये वे फिर से सत्ता के करीब पहुंच जायेंगे। यह वहीं कांग्रेस है जो कि इंदिरा गांधी के मृत्यु के बाद 414 सीटें जीत कर सत्ता में आयी थी और इसी देश के नागरिकों ने पुरे 5 दशक तक इस पार्टी को देश की सत्ता सौंपी थी, किन्तु कांग्रेस बदले भारत के मतदाताओं की सोच को नहीं पढ़ पायी। लोगों की सोच बदली है, इंटरनेट व टेक्नोलाॅजी के युग में लोग अब बहुत आगे तक निकल चुके हैं। अब पुरानी सोच के भरोसे चुनाव नहीं जीता जा सकता, यदि यह बात कांग्रेस समय रहते समझ गई होती तो शायद आज इतना बुरा हश्र नहीं होता। 
एक समय था जब कहा जाता था, देश के हर परिवार का एक सदस्य कांग्रेस से जुड़ा हुआ है। यह वह समय था जब कार्यकर्ता आधारित पार्टी काम करती थी, नेताओं ने इसे जनआंदोलन की तरह जीवंत रखा था। तब कांग्रेसी नेताओं द्वारा जन आंदोलनों के दौरान गांधी व नेहरू की बात कि जाती थी। तब नेता खादी और चरखे की बात किया करते थे खादी कपड़े और टोपी कांग्रेस की निशानी होती थी, आज ये सेवा दल का प्रतिक चिन्ह भर रह गया है। वह दौर था जब स्वमेव ही गांधी-नेहरू के उच्च आदर्शों को लोग आत्मसात किया करते थे, तब पार्टी में कार्य करने वाले सिपाही की फौज हुआ करती थी, आज अपने आप को नेता कहलाने, पार्टी पदाधिकारी बताने वालों की फौज है, आज नेता ज्यादा, फिल्ड में कार्य करने वाला सिपाही कम है। देश का आज़ादी दिलाने वाली पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस आज संकट व संघर्ष के दौर से गुजर रही है। जिसके लिये लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद भी मिलना दूर की कौड़ी लग रही है। क्योंकि कांगे्रस को आज कार्यकर्ताओं और आंदोलनों के दम पर नहीं बल्कि एसी कमरों में बैठ कर कारपोरेट मैंनेजमेंट की तरह चलाया जा रहा है। जो कभी विचारों व आंदोलनों के सहारे लोगों के घर-घर तक पहुंचती थी, उसे आज अपने आप को महात्मा गांधी से जोड़ कर परिचय देना पड़ रहा है, आखिर क्यों? जिस कांग्रेस की जवानी को गांधी ने अपने हाथों से सिंचा और जिसकी जिम्मेदारियों को नेहरू ने समेटा वहीं कांग्रेस आज इक्कीसवीं सदी में घुटने टेके खड़ी है। इसका प्रमुख कारण यह रहा कि गांव-गली और पगझण्डीयों को छोड़ कर कांग्रेस उन मौका परस्त नेताओं के हाथों की कठपुतली भर बनकर रह गई है जो कि अपना दब-दबा कायम रखने शहरी क्षेत्रों में पदाधिकारी बनकर कांग्रेस को चलाने का दंभ भर रहे हैं। कांग्रेस की दुर्गति चुनावी टिकट बंटवारे से शुरू होती है और वहीं पर आकर समाप्त भी हो जाती है। कांग्रेस दिखावे को तो चुनाव पूर्व काफी सर्वें कराती है, कहा भी जाता है राहुल फार्मुले से टिकट का वितरण होगा, किन्तु वास्तविक धरातल पर आते ही सारे सर्वे रद्दी में डाल दी जाती है और उन्हीं चापलुसों को टिकट दी जाती है जो कि हमेशा चुनाव हारते रहे हैं और गुटबाजी कर दूसरों को चुनाव हरवाते रहे हैं और फिर मौका पा चोर दरवाजे से संसद की दूसरी मंजिल राज्यसभा तक पहुंच जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में राहुल फार्मूले की भी बहुत बात हुई, युवक कांग्रेस से लेकर एनएसयूआई तक के चुनाव आज राहुल फार्मूले से हुआ करते हैं, किन्तु यूथ कांग्रेस व एनएसयूआई का क्या हश्र हो रहा है, सदस्यता से लेकर लोकतंत्रात्मक पद्धति से चुनाव के मापदण्ड तक किस तरह की धांधली चल रही है, सभी की जानकारी में है। अब राहुल युवक कांग्रेस व एनएसयूआई को तो बदल नहीं पाये। उनसे कैसे अपेक्षा की जाये कि अगले पांच सालों में वे कांग्रेस को एक नई ऊर्जा देकर फिर से सरकार बनाने लायक खड़ा कर पायेंगे।                                                                                                                                                      (क्रमशः...................)

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